Ancient History

Weekly Roundup

साहित्य में सरस्वती नदी घाटी सभ्यता(Saraswati River Valley Civilization in Literature)

इतिहास का कोई धर्म नहीं होता, वह निरपेक्ष होता है। इसलिए इतिहास को निपरेक्ष होना चाहिए, यदि वह निरपेक्ष नहीं तो वह इतिहास नहीं है। प्राचीन भारतीय इतिहास के साथ भी यही बात रही। विज्ञान के इस युग में सामाजिक ज्ञान प्राचीन ज्ञान की अपेक्षा अग्रेतर है। नव.पुरातन मान्यताओं और तर्काें की कसौटी पर रखते हुए नये.नये परिणाम खोजे जा रहे हैं और नये.नये विचारों को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। सरस्वती नदी, उसके प्रवाहित मार्ग, उसके तटों पर पनपी और विकसित हुई और पुनः उजड़कर विलुप्त हुई सभ्यता एवं संस्कृति और उसकी प्रथा-परम्परा, इतिहास, भूगोल, समाज, मानव- जाति, रहन.सहन, व्यवसाय, वेशभूषा, आस्था-विश्वास, धार्मिक जीवन, मृद्भाण्ड आदि के विषय में निरन्तर खोज करने और अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये विद्वत समाज वर्षों से अनवरत प्रयास कर रहा हसंस्कृति मानव समाज की अमूल्य निधि होती है। मानव इसलिये मानव है कि उसके पास संस्कृति है। संस्कृति के अभाव में मानव मानव नहीं, पशु के समान होता है। मनुष्य में कुछ ऐसी शारीरिक क्षमताएँ विद्यमान होती हैं, जिसके कारण वह संस्कृति का निर्माता होता है। मानव ही संसार में एक ऐसा प्राणी है, जो अपनी क्षमताओं और विशेषताओं के कारण सभ्यता और संस्कृति का निर्माण कर पाया।प्राचीन विश्व की अनेक सभ्यताएँ एवं संस्कृतियाँ प्रायः नदियों के किनारे ही विकसित हुई। उनकी कृषि, पशुपालन, नगर-नियोजन, धार्मिक जीवन, साहित्य, कला आदि का विकास सब कुछ नदी घाटी के किनारों पर ही पल्लवित एवं पुष्पित हुए। प्राचीन भारत में तो सभी प्रारम्भिक और छोट-.बड़े साहित्यिक ग्रन्थों जैसे वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, दर्शन आदि में से अधिकांश की रचना सरस्वती नदी घाटी में ही लिखे गये। जिसके कारण ही सरस्वती विद्या की देवी कहलायी। कृषि की अधिष्ठात्री देवी सीता, इसी सरस्वती का ही एक रूप है। इसी तरह पलक्षा नदी का दैवीय रूप लक्ष्मी है। ऋग्वेद के साक्ष्यों से भी ऐसा प्रतीत होता है कि सरस्वती का ही वर्तमान स्वरूप लक्ष्मी में विद्यमान है।एशिया की सभ्यताएँ विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ हैं। यहाँ की प्राचीन सभ्यताएँ किसी.न.किसी नदी के किनारे ही विकसित हुई। मिस्र की सभ्यता नील नदी के किनारे, भारत की सबसे पुरानी सभ्यता सिन्धु एवं सरस्वती नदी घाटी में तथा निकट पूर्व की सबसे प्राचीन सभ्यता दजला और फरात नदियों के किनारे पर ही विकसित हुई। इसी प्रकार चीन की सभ्यता ह्वांगहों और यांग-टी-सी-क्यांग के किनारे विकसित हुई। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एशिया की सभी सभ्यताएँ, जो कि विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ हैं, नदी घाटी के किनारे पर ही विकसित हुईं। ऋग्वेद में सरस्वती नदी का उल्लेख उत्तर पश्चिमी भारत में एक महान् और पवित्र नदी के रूप में मिलता है। 20वीं शताब्दी ईसवी के प्रारम्भ में पुरातत्त्ववेत्ताओं और भू.वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के उपरान्त यह सिद्ध करने का प्रयास किया और बताया कि ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का समीकरण घग्घर (घग्गर) हाकरा नदी से किया जा सकता है। क्रिश्चियन लासेन, मैक्समूलर, आरेल स्टाइन, सी.एफ. ओल्डन और जेन मंैकिटोस आदि विद्वानों ने सरस्वती नदी का समीकरण घग्गर-हाकरा नदी से करते हैं। डेनिनों का मत है कि ‘घग्गर-हाकरा का विस्तार सरस्वती का अवशेष था।’ फिलिप, विरदी और वी. के. एस. वाल्डिया महोदय ने सरस्वती का समीकरण घग्गर से स्थापित करने का प्रयास किया है। ग्रेगरी पोसेहल नामक विद्वान् का मत है कि ‘भाषाई’, पुरातात्त्विक और ऐतिहासिकता के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती नदी का समीकरण वर्तमान घग्गर या हाकरा से स्थापित किया जा सकता है।सरस्वती घाटी सभ्यता एवं संस्कृति को विश्व पटल पर लाने के लिए भारत सरकार के द्वारा पूर्व में श्री जगमोहन (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) ने एक चार सदस्यों वाली विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस विशेषज्ञ समिति में स्पेश एप्लीकेशन सेन्टर के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर श्री बलदेव सहाय, श्री वी. एम. पुरी, ज्योलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया, लखनऊ, डॉ. एस.कल्याणरत्नम, एशियन डेवलेपमेंट बैंक के पूर्व सीनियर एक्जीक्यूटिव श्री माधव चितलें, पूर्व सेक्रेटरी, ग्राउण्ड वाटर मैनेजमेण्ट की अध्यक्षता में आदिबद्र्री से भगवानपुर, सिरसा होते हुए कालीबंगन तक पुरातात्विक उत्खनन एवं अन्य सम्बन्धित कार्यों को करने की योजना बनायी गयी। यह सम्पूर्ण कार्य योजना को दो चरणों में सम्पादित किया गया। यद्यपि भारतीय इतिहास संकलन समिति के तत्त्वाधान में 1993 ई. में विलुप्त या सूखी हुई सरस्वती नदी को ढूढ़ने खोजने का कार्य प्रारम्भ किया गया था। तब से लेकर आज तक निरन्तर विद्वानों, इतिहासकारों, पुरातत्त्वेत्ताओं, भू.वैज्ञानिकों, लेखकों आदि द्वारा सरस्वती नदी से सम्बन्धित साक्ष्यों, स्थानों आदि को खोजने-लिखने के लिये कार्य किया जा रहा है। इस कार्य में श्री सी. एन. ओल्डहेन, श्री आरेल स्टाइन, डॉ0 बी.बी. लाल, श्री आर. एसण्. विष्ट, श्री के. जी. गोस्वामी, श्री रविप्रकाश आर्य, डॉ0 अशोक साहनी, श्री ओ. पी. भारद्वाज, श्री के. एफ. दलाल, श्री बी. घोष, श्री जे. एस. खत्री, श्री एम. आचार्य, श्री भगवान सिंह, श्री देवेन्द्र स्वरूप, श्री आर. सी. ठाकरान, श्री जगपति जोशी, श्री आर. एस. शर्मा, श्री के. सी.् यादव आदि अनेक विद्वानों, पुरातत्त्वविदों, वैज्ञानिकों, लेखकों आदि का योगदान सरस्वती नदी को बूढ़ने में सराहनीय रहा। जिससे भारतीय इतिहास को एक नया आयाम मिला।साहित्य में सरस्वती-ऋग्वैदिक संस्कृति का मूल केन्द्र पंजाब से पूरब की ओर सरस्वती और दृषद्वती नदियों के मध्य भाग तक सीमित था। मनु महोदय ने इसे ब्रह्मावर्त कहा है। यथा-सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते।। ऋग्वेद में लगभग 40 नदियों के नाम का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का विवरण मिलता है। पहली गंगा और अन्तिम गोमल (गोमती) है। ऋग्वैदिक सभ्यता एवं संस्कृति का विस्तार कुरुक्षेत्र तक था। आर्यों के राज्य की सीमा का विस्तार कुरु-पांचाल तक हो गया था। सात प्रमुख नदी में से एक नदी सरस्वती है। यह नदी पुण्य सलिला है। कोई भी पूजा आदि करने के पहले इस नदी का आहवाहन करना आवश्यक होता है। यथा-गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु।।ऐसी मान्यता है कि पूजा के लिये प्रयुक्त होने वाले जल में उक्त 7 पुण्यसलिला नदियाँ अवस्थित है। ऋग्वेद के मंत्रों में सरस्वती नदी की दिव्य महिमा का वर्णन मिलता है। इस नदी के साथ अनेक ऐतिहासिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक घटनाएँ जुड़ी हैं।ऋग्वेद के मंत्र 10/64/8-9 में 21 नदियों की चर्चा मिलती है। जिसमें सरस्वती, सरयू और सिन्धु का दैवी नदी तथा माता के रूप में उल्लेख...

भारतीय सिक्कों की प्राचीनता(Antiquity of Indian coins )

प्राचीन भारतीय इतिहास के विकास में साहित्य की भाँति पुरातात्विक स्रोतें का विशेष योगदान रहा है। प्राचीन सिक्कों से लुप्त ऐतिहासिक घटनाओं को उद्घाटित करने में सहायता मिलती है। सिक्के इतिहास लेखन में एक महत्वपूर्ण उपकरण माना जाता है। जैसे मानव आदिम, जंगली जीवन से हटकर आवासीय समुदायों की ओर अग्रसर हुआ वैसे ही सामाजिक नियमों और भौतिक प्रगति किया। विकास पथ पर द्रुतगति से अग्रसरित मानव जाति को अपने व्यावहारिक जीवन में वस्तु विनिमय की अपेक्षा मुद्रा की आवश्यकता की प्रतीति कालक्रमेण देर से हुई। वस्तु विनिमय प्रणाली केरूपान्तर आज भी आधुनिक भारतीय समाज में विद्यमान हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ दैनिक आश्यकता की वस्तुओं को अनाज, पुराने कपड़े या पशुधन के बदले प्राप्त किया जाता है। वास्तव में मुद्रा का सम्बन्ध व्यवहार से जुड़ा हुआ है। विदेशी विद्वानों की मान्यता रही है कि सिकन्दर के आगमन के बाद भारत में सिक्कों का प्रचलन हुआ। लेकिन पुरातात्विक उत्खनन से लब कार्षापण सिक्कों का पता चला तो विदेशी विद्वानों की धारणा खण्डित हो गयी। सत्य तो यह है कि भारत में प्राचीन काल से सिक्कों का प्रचलन हो गया था। अतः मुद्रा निर्माण के इतिहास को निम्नलिखित युगों में विभाजित करके उन पर विस्ताार से विचार किया जाना आवश्यक है।मुद्रा निर्माण के इतिहास का युग निम्नलिखित है- (ब) सुवर्ण निष्क का भी गोपथ ब्राह्मण में वर्णन मिलता है, जिसमें कहा गया है कि कुरु-पांचाल के ऋषि उद्दालक आरुणि ने अपने ध्वज में निष्क धारण किया था। उनकी घोषणा थी कि जो उन्हे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, उसे वे ‘निष्क’ देंगे।स्पष्ट है कि यहाँ भी निष्क का प्रयोग क्रय-विक्रय के प्रसंग में नहीं है।(स) छान्दोग्योपनिषद में एक राजा के किसी ऋषि से अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति हेतु 1000 रथ, 10000 गाय, 1000 गाँव एवं 1 निष्क देने की घोषणा का उल्लेख है।यहाँ वस्तुओं की तुलना में निष्क पर्याप्त मूल्यवान दिखाई देता है। परन्तु कहीं भी विनिमय का संकेत नहीं है।(2) शतमान – शतमान तत्कालीन समय में दक्षिणा के रूप में प्रयुक्त होता था।‘‘तस्य वै भीणि शतमानानि हिरण्यानि दक्षिणां।’’राजसूय यज्ञ के अवसर पर रथ दौड़ में रथ के पहिए में दो शतमान बांधे जाते थे। जो कालान्तर में दक्षिणा में दे दिए जाते थे। शतमान को एक स्थल पर वृत्ताकार बताया गया है। अन्यत्र शतमान के 100 वर्ष के जीवन व्यतीत करने के लिए यज्ञकर्ता द्वारा शतमान देने का उल्लेख है- ‘शतमानं भवति शतायुर्वे पुरुषः।’(3) सुवर्ण ? – परवर्तीकाल में सुवर्ण 80 रत्ती या 144 ग्रेन का सिक्का था। उत्तर वैदिक काल में शतमान के विकल्प के रूप में इसे दिया जाना, इसके निश्चित की सूचना देता है।(4) पाद- उत्तर वैदिक काल में ‘पाद’ का भी वर्णन मिलता है जिसका अर्थ 1.5 या आधा होता था। वृहदारण्यक उपनिषद में राजा जनक द्वारा 100 गायों के दान करने का उल्लेख है, जिनमें से प्रत्येक गाय की सींग में 10 पाद बँधे हुए थे।पतंजलि ने ‘पादनिष्क’ या ‘पनिष्क’ का वर्णन किया है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उत्तर वैदिक साहित्य में ‘निष्क’, ‘सुवर्ण’, ‘शतमान’ व ‘पाद’ का उल्लेख दान के प्रसंग में मिलता है न कि क्रय-विक्रय के प्रसंग में। इन पर कोई राज्योचित चिन्ह मिलता है या नहीं, अभी अस्पष्ट है। इनके निश्चित तौल के विषय में भी हम अनभिज्ञ हैं। प्रायः गायें अब भी वस्तु विनिमय की साधन थी।(5) कृष्णल- तैत्तरीय ब्राह्मण में कृष्णल का उल्लेख मिलता है।‘कृष्णलं कृष्णलं वाजसृदभयः प्रयच्छर्ति।रत्ति (रत्तिका) को कृष्णल कहते थे। वास्तव में रत्ति पेड़ का फल है, किन्तु इसका अर्थ यह है कि स्वर्ण-पिण्ड से काटकर एक-एक रत्ती दिया जा रहा हो। कृष्ण्ल कोई सिक्का नहीं हो सकता, क्योंकि परवर्तीकाल में यह सिक्का नहीं था।

भारत में सिक्कों की उत्पत्ति(Origin of Coins in India)

मनुष्य की विकसित अवस्था के सन्दर्भ में मुद्रा एक मानक बनकर हमारे सामने आया। यह विनिमय का एक माध्यम है। इसका आविष्कार मनुष्य के विकसित और परिष्कृत विचार का प्रतीक है जिससे वह उन वस्तुओं को प्राप्त करता है जिसकी उसे आवश्यकता होती है। स्पेन्सर महोदय का मत है कि समय के विकास और कार्य विभाजन के फलस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति भोजन अर्जन एवं शस्त्र निर्माण के कार्य में लग गया। जिसके फलस्वरूप कार्य विभाजन से समाज को सुविधा हुई। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ वैसे-वैसे उनकी आवश्यकताओं में वृद्धि हुई। एक दूसरे के सम्पर्क में आने के कारण वस्तुओं के प्रति इच्छायें प्रबल हुई होंगी। इसके कारण अपनी वस्तु को दूसरे को देकर उस वस्तु को पाने का विचार आया। इस प्रकार समाज में वस्तु-विनिमय का प्रचलन शुरू हुआ। वैदिक काल में वस्तु-विनिमय का प्रलचन था। गाय को भी वस्तु-विनिमय का माध्यम माना गया।   विद्वानों ने इस वस्तु-विनिमय को सिक्कों की उत्पत्ति का आरम्भ माना है। कालान्तर में इसमें कुछ कठिनाइयाँ आयीं कि वस्तुओं का वास्तविक एवं पारस्परिक मूल्य कैसे निश्चित किया जाए? मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ लोगों में धातुओं के प्रति आकर्षण बढ़ा जिसके कारण मानव ने धातु की बनी वस्तुओं को संगृहीत करना आरम्भ किया। सिक्कों के विकास की यह सबसे महत्वपूर्ण समय था जब धातु का प्रयोग सिक्कों के रूप में किया जाने लगा। हड़प्पा सभ्यता के पुरास्थलों से धातु के अवशेष मिलते हैं। धातु के प्रयोग से व्यापार अत्यन्त सुगम हो गया। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि सिक्कों के विकास में मनुष्य का योगदान मुख्य रहा। आगे चलकर शासक वर्ग ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। प्रो.वासुदेव उपाध्याय के अनुसार सोने को मूल्यवान् समझ कर लोग कोई अन्य सस्ती वस्तु ढूंढने लगे जिससे सस्ती वस्तु खरीदी जा सके। इस तरह चाँदी और ताँबे के सिक्के का प्रयोग हुआ। डा.परमेश्वरी लाल गुप्त के अनुसार- ‘कालान्तर में कुछ वस्तुओं को अधिक महत्व दिया जाने लगा और उनका मूल्य ऊँचा आंका गया। इस प्रकार उन वस्तुओं को विनिमय का माध्यम बना लिया गया जिनका एक मानक स्वरूप तैयार कर लिया गया। इस प्रकार ईकाई मूल्य की धारणा समाज में फैल गई। जिससे सर्वप्रथम मुद्रा का विकास हुआ। मुद्रा की प्राचीनता एवं उद्भव- भारत में मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुद्राशास्त्रियों में व्यापक मतभेद रहा है। इस मतभेद का कारण है कि मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो साक्ष्य प्राप्त होते हैं, वे बहुत ही कम हैं। इसके अतिरिक्त स्पष्टता के अभाव में विद्वानों के समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न होतीं हैं। इसके अतिरिक्त प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय सिक्के स्वतंत्र रूप से निर्मित किये गये या किसी अन्य देश का अनुकरण के आधार पर निर्मित किया गया। आज से दो-तीन दशक पूर्व मुद्रा की उत्पत्ति का विषय अत्यन्त विवादास्पद रहा है। संभवतः व्यापारियों ने व्यापार की सुविधा एवं लेन-देन में सुगमता हेतु सर्वप्रथम सिक्कों का प्रवर्तन किया। प्रारम्भ में शासक वर्ग इस दिशा में उदासीन रहा, लेकिन बाद में इसे अपने अधिकार में ले लिया। मौर्य काल के समय यह राज्य के नियंत्रण में आया। मुद्रा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों ने अनेक अवधारणायें प्रस्तुत की हैं। भारत में मुद्रा की प्राचीनता के दो सिद्धान्त मुख्य रूप से प्रचलित हैं- 1.            विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। 2.            स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त। विदेशी उत्पत्ति के सिद्धान्त को तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ख) ईरानी उत्पत्ति का सिद्धान्त (ग) बेबीलोनियन उत्पत्ति का सिद्धान्त  (क) यूनानी उत्पत्ति का सिद्धान्त – प्रख्यात विद्वान विल्सन और प्रिंसेप के अनुसार भारत में सिक्कों का प्रचलन यूनानी आक्रमण के बाद में हुआ। विल्सन का मत है कि भारतीय लोग विनिमय के लिए चिन्हरहित धातु के टुकड़ों का प्रयोग करते थे। धातु-खण्ड़ों पर चिन्ह बनाकर मुद्रा के रूप में प्रयोग करने का आरम्भ बैक्ट्रिया और रोम के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो जाने के बाद हुआ। प्रिसेंप महोदय ने इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि ‘इस बात में सन्देह है कि सिकन्दर के आगमन के पूर्व भारत में सिक्के प्रचलित थे।’ उन्होंने अपने मत को औदुम्बर मुद्रा तथा यूनानी सिक्के की समानता पर आधारित किया। खेद है कि इन विद्वानों ने आहत (चिन्हित) सिक्कों के प्रचलन पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। यद्यपि प्रिसेप महोदय ने अपने मत में परिवर्तन किया और यह मान लिया कि यूनानियों के आगमन के पूर्व भारतीय धातु-खण्ड़ों का प्रयोग विनिमय के रूप में करते थे जो चिन्हरहित होते थे और उन धातु खण्ड़ों का चिन्हांकित होना यूनानियों के भारत आगमन के बाद ही संभव हो पाया था। भारतीय सिक्के राष्ट्रीय हैं तथा उनका निर्माण स्वदेशी था। आलोचना- वर्तमान समय में प्रिंसेप और विल्सन के विचारों को मुद्राशास्त्रियों ने आधारहीन बताया है। विद्वानों ने निम्नलिखित आधार पर इस अवधारणा का खण्डन किया है- भारत की प्राचीनतम मुद्रा आहत मुद्रा है जिसे धातु खण्डों पर पीटकर चिन्ह बनाये जाते थे। इन आहत मुद्राओं एवं यूनानी मुद्राओं में अनेक अन्तर स्पष्ट परिलक्षित होते हैं।        2.   यूनानी सिक्के वृत्ताकार हैं जबकि भारतीय आहत मुद्राएँ वृत्ताकार, चैकोर, अण्डाकार आदि कई आकारों में निर्मित होते थे। इनके निश्चित आकार में न होने का कारण यह था कि इनके किनारे से धातु के टुकड़ों को काटकर एक निश्चित माप और तौल में निर्मित किया जाता था।       3.      यूनानी मुद्राओं पर मुद्रा लेख का अंकन मिलता है जबकि भारतीय आहत मुद्रायें लेख रहित हैं।      4.       यूनानी मुद्रा सामान्यतः 67 ग्रेन का होता था। जबकि आहत मुद्रा की तौल सामान्यतः 56 ग्रेन होती थी।      5.       यूनानी मुद्रा के अग्रभाग पर राजा की आकृति और पृष्ठभाग पर यूनानी देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं। इसके विपरीत भारतीय मुद्राओं पर कोई निश्चित चिन्ह न होकर चिन्हों के समूह अंकित हैं। यूनान के आयोनियन समुद्र तट से प्राप्त कुछ प्राचीन मुद्राओं पर आहत चिन्ह बने अवश्य हैं, लेकिन ये चिन्ह भारतीय चिन्हों से सर्वथा भिन्न हैं। इन मुद्राओं पर आहत चिन्ह केवल पृष्ठभाग पर एवं बहुत ही कम मात्रा में हैं। ये या तो वृत्ताकार या लम्बे आकार की हैं। दूसरी बात यह है कि आयोनियन समुद्र तट की मुद्रायें गिलट (इलेक्ट्रम) की बनीं हैं। ये मुद्रायें भारतीय क्षेत्र से इतनी दूर की धरती से भी नहीं मिलती हैं। अतः इनसे भारतीय...

सिन्धु सभ्यता में आर्थिक जीवन(Economic life in the Indus Valley Civilization)

प्राचीन भारतवर्ष वर्तमान भारत से बहुत बड़ा था। उसकी सीमा में वर्तमान पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश सम्मिलित था। वैदिक साहित्य में देश के रूप में भारत का उल्लेख नहीं मिलता। इसका उल्लेख सर्वप्रथम पुराणों में मिलता है।                 उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमादे्रश्चैव दक्षिणम्।                 वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।। (विष्णु पुराण) इस नाम का सबसे पहला आभिलेखिक उल्लेख खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है। यथा-                 दसमे च वसे दंड संधी सा (ममयो) भरदवस पठानं। अशोक के अभिलेखों में इसे जम्बूद्वीप कहा गया है। सिन्धु सभ्यता की भौगोलिक स्थिति एवं उन्नत आर्थिक अवस्थाओं के पीछे उन क्षेत्रों की तत्कालीन पारिस्थितिकी, उनका समुन्नत तकनीकी ज्ञान, शीघ्रगमन के लिए पहियों वाली गाड़ियों का प्रयोग और प्राकृतिक शथ्कत से पूर्ण संसाधनों के विकास ने महत्वपूर्ण योग प्रदान किया होगा। उत्खननों से प्राप्त पुरा सामग्रियों के तिथि निर्धारण के फलस्वरूप भारतीय सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास के विकास के अध्ययन को एक तैथिक आधार प्राप्त हुआ। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की विशालता एवं इसकी समृद्धि इस बात को स्पष्ट करती है कि सिन्धु सभ्यता के लोगों की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी। सैंधव सभ्यता के समृद्ध आर्थिक जीवन में कृषि, पशुपालन, विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधों तथा व्यापार-वाणिज्य का प्रमुख योगदान था। कृषकों के अतिरिक्त उत्पादन और व्यापार-वाणिज्य के विकास के कारण ही इस नगरीय सभ्यता का विकास हुआ था। कृषि पर आधारित अनाज उत्पादन की समुन्नत तकनीकों और विशेष शिल्पों का जब बहुत अधिक प्रयोग प्रारम्भ होता है तब किसान इतना अधिक अन्न उत्पन्न करने लगता है  िकवह उससे केवल अपना ही भरण-पोषण नहीं करता अपितु शासक, पुरोहित, सैनिक एवं शासक और वहाँ के निवासी और व्यापारी, शिल्पी भी उसके उत्पाद से ही अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। कृषि – प्राचीन भारत की भौगोलिक बनावट ही कृषि और कृषिपरक क्रियाकलापों के विकास और विस्तार के लिए इतनी अनुकूल थी कि यहाँ अत्यन्त प्रारम्भ में ही श्री गणेश न हो जाता तो कोई आश्चर्य की बात होती। आज की अपेक्षा सिंधु प्रदेश की भूमि पहले बहुत ऊपजाऊ थी। ई.पू. चैथी सदी में सिकंदर के एक इतिहासकार ने कहा था कि सिंधु की गणना इस देश के उपजाऊ क्षेत्रों में की जाती थी। पूर्व काल में प्राकृतिक वनस्पतियों बहुत अधिक थीं, जिसके कारण यहाँ अच्छी वर्षा होती थी। पकी ईंटों की सुरक्षा-प्राचीरों से संकेत मिलता है कि नदियों में बाढ़ प्रतिवर्ष आती थी। सिंधु तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा प्रति वर्ष लायी गयी उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी इस क्षेत्र की उर्वरता को बहुत बढ़ा देती थी, जो कृषि के लिये महत्त्वपूर्ण थी। यहाँ के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवम्बर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बुआई कर देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रैल के महीने में गेहूँ तथा जौ की फसल काट लेते थे। सिंधु नदी घाटी के उपजाऊ मैदानों में मुख्यतः गेहूँ और जौ का उत्पादन किया जाता था। अभी तक नौ फसलों की पहचान की गयी है। गेहूँ बहुतायत में उगाया जाता था। जौ की दो और गेहूँ की तीन किस्में उपजाई जाती थीं। गेहूँ के बीज की दो किस्में स्परोकोकम तथा कम्पेस्टस उत्खनन में प्राप्त हुई हैं। बनावली में मिला जौ उन्नत किस्म का है। चावल की खेती केवल गुजरात (लोथल) और सम्भवतः राजस्थान में की जाती थी। लोथल से धान तथा बाजरे की खेती के अवशेष मिले हैं। इसके अलावा राई, खजूर, सरसों, तिल एवं कपास की भी खेती होती थी। सम्भवतः सबसे पहले कपास यहीं पैदा की गयी, इसीलिये यूनानी इस प्रदेश को ‘ सिंडन ’ कहते थे। यही नहीं, वे अनेक प्रकार के फल व सब्जियों भी उपजाते थे। हड़प्पाई पुरास्थलों के उत्खनन में पीपल, खजूर, नीम, नींबू, अनार एवं केला आदि के प्रमाण मिले हैं। इस समय खेती के कार्यों में प्रस्तर एवं काँसे के बने औजार प्रयुक्त होते थे। यहाँ कोई फावड़ा या हल का फाल तो नहीं मिला है, किन्तु कालीबंगा की प्राक् हड़प्पा सभ्यता के स्तर से जो कूट (हलरेखा) मिले हैं, उनसे स्पष्ट है कि राजस्थान में इस काल में हलों द्वारा खेतो की जुताई की जाती थी। धातु के हल के अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं परन्तु इसकी उच्च कोटि की जुताई में सन्देह नहीं किया जा सकता है। बणावली में मिट्टी का  बना हुआ हल-जैसा एक खिलौना मिला है। डी, डी, कौशाम्बी महोदय का मत है कि सैन्धव लोगों को भारी हल का ज्ञान नहीं था। इस मत को इस प्रकार खण्डित किया जा सकता है-प्रथम बहावलपुर एवं बणावली से मिट्टी के बने हल का मिलना। दूसरे यह मत ऐसे भी खारिज हो जाता है कि बिना हल के गहरी जुताई नहीं किया जा सकता। यदि यह न हो तो अधिशेष नहीं निकल पायेगा और न ही नगरीकरण ही हो पायेगा। जबकि हम सभी जानते हैं कि  सैन्धव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। मेहरगढ़ (पाकिस्तान) से कृषि – गेहूँ, जौ, अंगूर एवं कपास का प्रमाण मिला है। सम्भवतः सिंचाई के लिये नदियों के जल का प्रयोग किया जाता था। जलाशयों एवं कुओं से भी सिंचाई किया जाता रहा होगा। फसलों की कटाई के लिये सम्भवतः पत्थर या काँसे की हँसिया का प्रयोग किया जाता था। मेहरगढ़ से हँसिया का साक्ष्य मिला है। अनाज रखने की टोकरियों के भी साक्ष्य मिले हैं। अतिरिक्त उत्पादन को राज्य द्वारा नियन्त्रित भंडार गृहों (कोठारों या अन्नागारों) में रखा जाता था। मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल अन्नागार इसका प्रमाण है। अनाज को चूहों से बचाने के लिये मिट्टी की चूहेदानियों का प्रयोग किया जाता था। अनाज कूटने के लिये ओखली और मूसल का प्रयोग होता था। लोथल से आटा पीसने की पत्थर की चक्की (जाँता) के दो पाट मिले हैं। लोथल और रंगपुर से मिट्टी के कुछ बर्तनों में धान की भूसी मिली है। पशुपालन – सैंधव सभ्यता में कृषि के साथ-साथ पशुपालन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। पशु कृषि एवं यातायात के साधन थे।मृद्भांडों तथा मुहरों पर बने चित्रों एवं अस्थि-अवशेषों से लगता है कि मुख्य पालतू पशुओं में डीलदार एवं बिना डील वाले बैल, भैंस, गाय, भेड़-बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर और सुअर आदि थे। हड़प्पाई लोग सम्भवतः बाघ, हाथी तथा गैंडे से भी परिचित थे, किन्तु हाथी व घोड़ा पालने के साक्ष्य प्रमाणित नहीं हो सके हैं। हड़प्पा से गधे की हड्उी प्राप्त हुई है। एस. आर. राव को...

सैन्धव सामाजिक जीवन(Saindhav Social Life)

सैन्धव सामाजिक जीवन मानव सभ्यता का आरम्भ भारत में ईसा से लगभग एक लाख वर्ष पूर्व हुआ। जब इस बात की चर्चा भारतीय शास्त्रों और पुराणों के आधार पर की जाती थी तो विदेशी ही नहीं भारतीय भी इसे मजाक मानते थे. लेकिन जब 1957 ई. में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर, जिन्हें भारत में ‘पाषाण कला का पितामह’ कहा जाता है, ने भीमबेटिका या भीमबैठका (मध्य प्रदेश) के शैलाश्रय की खोज की। इस शैलाश्रय पुरास्थल से प्रागैतिहासिक काल में मानव के आवास के साक्ष्य प्राप्त होते हैं। भीमबैठका से प्राप्त औजारों एवं अन्य वस्तुओं का काल निर्धारण जब किया गया तब विश्व के पुरातत्त्वविदों को यह मानना पड़ा कि भारत में निश्चय ही ईसा में लगभग एक लाख वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के भीमबैठका में मानव निवास करता था। इतिहास में सिन्धु घाटी की सभ्यता के नाम से विख्यात हड़प्पा सभ्यता भारत की वह महान् सभ्यता है, जिसके आधार पर हम भारतीय गर्व से कह सकते हैं कि भारतीय स्त्री-पुरुषों ने बहुत ही सुनियोजित ढंग से नगरों में बसना आरम्भ कर दिया था। ग्रामों के साथ-साथ विशाल नगर स्थापित किये जा चुके थे और भौतिक साधनों की अधिकता से मानव-जीवन आनन्द एवं उल्लास से भर गया था। 1921ई. से पहले अतीत के खण्डहरों में दबी हुई इस सभ्यता का ज्ञान न होने से पूर्व यह माना जाता था कि भारतीय मानव विश्व सभ्यताओं की तुलना में बहुत बाद में सभ्य हुआ। भारतीयों के पास प्राचीनतम सभ्यता के रूप में ऋग्वैदिक संस्कृति का ही ज्ञान था। यह ऋग्वैदिक संस्कृति विश्व की प्राचीन सभ्यताओं-सुमेरियन, बेबीलोनियन, नील नदीघाटी की मिस्र सभ्यता से बहुत बाद की थी कि भारतीय मानव विश्व के अन्य स्रोतों की तुलना में जिन्दगी की कला में, रहन-सहन के साधनों में विद्वतापूर्ण तरक्की एक लम्बे सफर के बाद बहुत देर से कर पाया था। सिन्धु सभ्यता के इतिहास ने पूर्व न्यायाधीशों के निर्णयों को बदल दिया और यह साबित कर दिया कि भारत अपने उषाकाल में यौवन को प्राप्त कर चुका था। नव पाषाणकालीन संस्कृति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है- गैर-धात्विक उपकरण और कृषि की जानकारी के साथ ग्रामीण जीवन का विकास। माना जाता है कि मानव ने सर्वप्रथम जिस धातु को औजारों में प्रयुक्त किया, वह ताँबा था और इसका सबसे पहले प्रयोग करीब 5000 ई.पू. में किया गया। जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और ताँबे के औजारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उस काल को ‘ताम्र-पाषाणिक काल’ कहते हैं। भारत की ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों में गैर-नगरीय और गैर-हड़प्पाई संस्कृतियों की गणना की जाती है। सर्वप्रथम इनका उदय दूसरी सहस्त्राब्दी ई.पू. में हुआ और जिनको अंत में लौह प्रयोक्ता संस्कृतियों ने विस्थापित कर दिया। तिथिक्रम के अनुसार भारत में ताम्रपाषाणिक बस्तियों की अनेक शाखाएँ हैं। कुछ तो प्राक् -हड़प्पाई है कुछ हड़प्पा संस्कृति के समकालीन हैं, और कुछ हड़प्पा के बाद की हैं। प्राक् हड़प्पाकालीन संस्कृति के अंतर्गत राजस्थान के कालीबंगा एवं हरियाणा के बनावली स्पष्टतः ताम्र-पाषाणिक अवस्था के हैं। कृषि का ज्ञान हो जाने के बाद प्राचीन कालीन मानव अधिकतर उस स्थान पर बसना पसन्द करते थे, जहाँ की भूमि कृषि के योग्य होती थी और सिंचाई की समुचित व्यवस्था होती थी। इसी कारण अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं का विकास नई घाटी एवं उसके समीपवर्ती प्रदेशों में हुआ। सामाजिक जीवन – सिन्धु सभ्यता की लिपि अब तक न पढ़े आने के कारण सामाजिक जीवन के विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है। फिर भी सैंधव सभ्यता के विभिन्न स्थलों से पाये गये पुरावशेषों के आधार पर इस सभ्यता के सामाजिक जीवन, रहन-सहन आदि के बारे में कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। सैन्धव समाज में सामाजिक स्तरीकरण था। विद्वान, पुरोहित, योद्धा, व्यापारी, श्रमिक आदि को वर्ण व्यवस्था का पूर्व रूप मान सकते हैं। भवनों के आकार-प्रकार एवं आर्थिक विषमता के आधार पर लगता है कि विश्व की अन्य सभ्यताओं की भाँति हडप्पाई समाज भी वर्ग-विभेद पर आधारित था। दूसरे रक्षा प्राचीरों से घिरे दुर्ग इस ओर संकेत करते हैं कि यहाँ सम्पन्न व्यक्ति (पुरोहित तथा शासक वर्ग) रहता था। निचले नगर क्षेत्र में व्यापारी, अधिकारी, शिल्पी, एवं सैनिक रहते थे। कृषक, कुम्भकार, बढ़ई, जुलाहे, शिल्पी, श्रमिक आदि सैन्धव समाज के अन्य वर्ग रहे होंगे। मोहनजोदडो से प्राप्त कुछ कक्षों को कुम्हारों की बस्ती माना जाता है। बणावली से प्राप्त व्यापारी एवं आभूषण निर्माता के मकान, लोथल से प्राप्त बाजार वाली गली एवं नौसारों से प्राप्त मुहरों से व्यापारी वर्ग का अस्तित्व प्रमाणित होता है। उच्च वर्ग के लोग मूल्यवान धातु-पत्थरों के आभूषण प्रयोग करते थे, जबकि निम्नवर्गीय लोगों के आभूषण मिट्टी, सीप एवं घोंघे के होते थे। विशाल भवनों के निकट मिलने वाले छोटे आवासों से स्पष्ट है कि समाज में वर्ग-विभाजन विद्यमान था। प्राप्त पुरावशेषों से हडप्पाई समाज में शासक, कुलीन वर्ग, विद्वान, व्यापारी तथा शिल्पकार, कृषक और श्रमिक जैसे विभिन्न वर्गों के अस्तित्व की सूचना मिलती है। दुर्ग के निकट श्रमिकों की झोपड़ियाँ मिली हैं। इन हड़प्पाई श्रमिक-बस्तियों के आधार पर ह्नाीलर महोदय ने समाज में दास प्रथा के अस्तित्व का अनुमान किया है। डी. एच. गार्डेन का मत है कि सैन्धव स्थलों के उत्खनन से कतिपय ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं, जिनमें पुरूषों एवं स्त्रियों को अपने घुटनों को बाँहों से घेरकर बैठे हुए दिखाया गया है। उनके शिरों पर गोल टोपी भी है। ये मूर्तियाँ गुलामों की हैं। इससे स्पष्ट है कि सैन्धव समाज में दास प्रथा का प्रचलन रहा होगा।  यद्यपि कुछ पुराविद् इससे सहमत नहीं हैं। इस सभ्यता के लोग युद्धप्रिय कम, शांतिप्रिय अधिक थे। परिवार – सम्भवतः समाज की इकाई परिवार था। उत्खनन में प्राप्त विशाल भवनों के आधार पर अनुमान है कि बड़े परिवारों में अनेक व्यक्ति रहते होंगे। खुदाई में प्राप्त बहुसंख्यक नारी-मूर्तियों से लगता है कि प्राक् -आर्य संस्कृतियों की भाँति सैंधव समाज भी मातृसत्तात्मक था। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई थी, जिसमें पति-पत्नी उनके बच्चे होते थे। परिवार की देख-रेख, उनके भरण-पोषण आदि की व्यवस्था करना पति का कर्तव्य था। सैन्धव पुरास्थलों से प्राप्त स्त्री-मूर्तियाँ सिन्धु समाज की दो विशेषताओं की अभिव्यक्ति करती हैं, प्रथम स्त्री को भोग की वस्तु माना जाता था। द्वितीय स्त्री मूर्तियों से यह भी स्पष्ट होता है कि तत्कालीन समाज में स्त्रियाँ विभिन्न प्रकार के कार्यों को सम्पादित करती थीं और पुरुषों का सहयोग करती रही होगी। ऐसा लगता...

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